लोगों की जेब निचोड़ने को बेताब बाजीगर अब नए जुगाड़ के साथ बाजार में उतर आए हैं। जो लोग शान से हुक्का गुड़गुड़ा रहे हैं, उन्हें मालूम नहीं है कि धुएं के साथ उनकी रगों में अरब मुल्कों से आया वहां का पुराना नशा ‘शीशा’ घुल रहा है, जो फेफड़ों के कैंसर जैसी घातक बीमारी का सबब भी बन सकता है।
दुबई, अमेरिका, यूएई, फ्रांस सहित कई बड़े देशों में प्रतिबंधित नशा शीशा चुपके-चुपके अजमेर में पैठ जमा चुका है। नशेड़ियों के आम ठिकानों से इतर यह हुक्का आलीशान रेस्टोरेंट में खुलेआम परोसा जा रहा है। जाहिर है इसके शौकीन मोटी जेब वाले ही हैं।
पुलिस और प्रशासन हालात से बेखबर हैं, इसलिए नया धंधा आसानी से चांदी काटने का जरिया बन गया है। विदेशों में इस तरह का नशा मुहैया कराने वाले रेस्तरां कारोबारियों के खिलाफ एंटी ड्रग्स कानून के तहत कार्रवाई के सख्त निर्देश हैं। जानकारों की मानें तो यहां शातिर लोगों ने इसका तोड़ भी फ्लेवर्ड शीशे के रूप में निकाल लिया है। मैलेशिश (शीरा) के साथ टेबोनल या मसाल या जर्क के गर्म होने पर शीशा तैयार होता है। टेबोनल, जर्क और मसाल निकोटीन व तंबाकू युक्त पदार्थ हैं।
डॉक्टरों के अनुसार शीशा के हर कश में लगभग 4 हजार रसायन होते हैं, जिसमें से ४३ घातक यानी कैंसर कारक होते हैं। जैसा कि कमला नेहरू टीबी अस्पताल के मेडिकल ऑफिसर डॉ. प्रकाश एस पंडित ने बताया, किसी रेस्तरां, होटल या अन्य कहीं भी शीशा का धूम्रपान कर रहे व्यक्ति के साथ पास बैठे लोगों को भी कई घातक रोग लग सकते हैं।
इनमें अस्थमा अटैक, ब्रोंककाइरिस, लंग्स कैंसर, पिलिहा कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर, हृदय रोग, नाक, कान, गला रोग, डिमेनशिया (भूलने की बीमारी) आदि शामिल हैं। डॉ. पंडित ने बताया कि यदि कोई महिला इस लत या पैसिव स्मोकिंग की शिकार हो रही है तो उसका होने वाला बच्च लो बर्थ वेट का होने की आशंका रहती है। साथ ही कई बार सडन इंफैक्ट डेथ सिन्ड्रोम यानी मरा हुआ बच्च या टीबी पीड़ित बच्च होने का खतरा भी रहता है।
मालूम हो कि भारत में डबल्यूसीटीओएच की चौदहवीं प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान तत्कालीन यूनियन हेल्थ मिनिस्टर अंबूमणि रामदास ने सार्वजनिक स्थानों, होटलों, बीयर बारों और रेस्तरां में इस तरह के नशे को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया था। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन और कई वैज्ञानिक प्रमाणित कर चुके हैं कि शीशा की लत छोड़ना हेरोइन और कोकीन से भी ज्यादा कठिन है।
ऐसे बनता है शीशा
विशेषज्ञ बताते हैं मैलेशिश (शीरा) को हुक्के के जार में भरकर ऊपर रखी प्लेट में टेबोनल या मसाल या जर्क डाला जाता है। फिर इसे नीचे लगे बर्नर से गर्म कर किया जाता है। हुक्का पाइप से यह कश शीरा में होता हुआ पीने वाले के मुंह तक पहुंचता है। बॉडी वाल्व से सैट करके इसे खींचने की मात्रा को कम या ज्यादा किया जा सकता है।
धूम्रपान निषेध कानून के दायरे में आने वाले रेस्तरां के खिलाफ पुलिस सख्त कार्रवाई करेगी।
- हरिप्रसाद शर्मा, एसपी
रेस्तरां में हुक्का पिलाना अवैध है। तस्दीक होने पर संचालकों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
- राजेश यादव, कलेक्टर
खुले आम रेस्तरां में हुक्का पिलाना प्रतिबंधित है। लोगों को नशे की लत का शिकार बनाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
- राहुल प्रकाश, एएसपी
गफलत में खतरनाक लत
अजमेर. मोटी रकम खर्च कर नए नशे शीशा का शिकार लोग नहीं जानते कि वे गफतल में एक खतरनाक लत का शिकार हो रहे हैं। कारोबारी भी इसे साधारण बताकर लोगों को धोखे में रखते हैं। अजमेर में इस लत की चपेट में आने वालों में ज्यादातर युवा हैं।
स्कूल और कॉलेज के कई छात्र रोजाना इस घातक नशे के नए ग्राहक होते हैं। ऐसे रेस्तरां खुलने के बाद शहर में धीरे-धीरे नया, लेकिन चिंताजनक माहौल पनप रहा है। शीशा का शौकीनों में एक तरह से चेन सिस्टम चल रहा है। यानी युवा ग्रुप में शीशे का सेवन कर रहे हैं। शाम के समय ऐसे रेस्तरां में खासतौर पर युवाओं का जमघट देखा जा सकता है।
43 घातक रसायन..
जलती हुई तंबाकू निकोटीन छोड़ती है। जो कि टार (एक प्रकार का घातक रसायन) के साथ जुड़ जाता है। टार फेफड़ों में जाकर रक्त में धुल जाता है। निकोटीन एक एडिक्टिव सबस्टेंस है, जो कि मात्र सात सेकंड में मस्तिष्क तक पहुंच जाता है और रक्त वाहिनियों को सिकोड़ता है। जिससे रक्त दाब बढ़ता है, साथ ही तंत्रिका तंत्र को झटका लगता है। कमला नेहरू अस्पताल के डॉ. पंडित ने बताया कि यदि यह लंबे समय तक हो तो नंपूसकता निश्चित तौर पर हो जाएगी। यह महिलाओं में ओवेरियन कैंसर भी पैदा कर सकता है। इसकी लत या पैसिव स्मोक से लंग्स कैंसर, एंफेसीमा (सांस की बीमारी) और कोरेनॉरी हार्ट डीजीज हो सकती है।
ठेंगे पर एक्ट
कुछ समय पहले ही सख्ती से लागू हुए ध्रूमपान एक्ट की इन रेस्तरां में खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। यह शाम करीब सात बजे अजमेर के एक पॉश इलाके के रेस्टोरेंट का नजारा है। एक तरफ बच्चे, महिलाएं और अन्य लोग बैठकर खाना खा रहे हैं तो दूसरी आर धीमे संतीत के बीच खुले तौर पर शीशे का दौर जारी है। हालांकि रेस्तरां, बीयर बार, होटल, गेस्ट हाउस और अन्य कई स्थानों को पब्लिकप्लेस माना गया है, लेकिन इस मामले में किसी भी रेस्तरां के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है।
फ्लेवर ही तो है..
शहर में शीशा कई नए फ्लेवर में परोसा जा रहा है। इसमें वनीला, नारियल, गुलाब, जैसमीन, शहद, आम, स्ट्राबेरी, तरबूज, पुदीना, मिंट, चेरी, नारंगी, रसभरी, सेब, एप्रीकोट, चाकलेट, मुलेठी, काफी, अंगूर, पीच, कोला, बबलगम और पाइनएपल आदि शामिल हैं। लोगों को यह कहकर लत का शिकार बनाते हैं कि फ्लेवर ही तो है। लाइट नशा है, नुकसानदायक नहीं है।
पैसिव स्मोकिंग..
किसी व्यक्ति द्वारा धूम्रपान के बाद छोड़ा गया धुआं, यदि कोई अन्य व्यक्ति की सांस में जाता है तो यह पैसिव स्मोकिंग है। इसे सेकंड हेंड नशा या पर्यावरण तंबाकू सेवन भी कहते हैं। वैज्ञानिक प्रमाणों के मुताबिक, इससे कई घातक बीमारियां या फिर मौत भी हो सकती है। कई मासूम अनायास ही इस लत का शिकार हो जाते हैं।
थर्ड हेड भी..
वर्ष २क्क्क् में कुछ शोधकर्ताओं ने थर्ड हेंड स्मोकिंग की जानकारी दी थी। इनके मुताबिक शीशा या अन्य किसी भी धूम्रपान से निकलने वाले दरुगध युक्त अवशेष जो कि धूम्रपान करने वालों या अन्य पैसिव स्मोकर्स के कपड़ों की सतह पर पाया जाता है। इनमें भी कई घातक रसायन होते हैं। अधिक संपर्क में आने पर छोटे बच्चों में निकोटीन और उसके उप उत्पाद का स्तर बढ़ जाता है।
जान है तो जहान है..
पैसिव स्मोकिंग के शिकार होने से बचें।
यदि किसी रेस्तरां या सार्वजनिक स्थान में ऐसा हो रहा हो तो शिकायत करें।
छोटे बच्चों को यदि कोई व्यापारी या रेस्तरां संचालक तंबाकू या इससे जुड़े उत्पाद दे रहा है तो उसके खिलाफ शिकायत जरूर करें।
सब कुछ जानकर भी लोग इसके शिकार होते हैं, ऐसे लोगों को समझाकर रोका जा सकता है।
टार करे बीमार
कमला नेहरू टीबी अस्पताल के डॉ. पंडित ने बताया कि टार एक प्रकार का रेजिन युक्त पदार्थ है जो कि तंबाकू या केनेबिस (गांजा) के जलने पर निकलता है। यह सबसे घातक रसायन है। यह शीशा का धूम्रपान करने वालों के फेफड़ों में जम जाता है। जिससे उनके शरीर में कई रासायनिक क्रियाएं और यांत्रिक प्रक्रियाएं रुक जाती हैं। साथ ही जीभ की स्वाद कलिकाएं भी नष्ट हो जाती हैं। इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर ने 1986 में टार को कैंसर कारक रसायन घोषित कर दिया था।
प्रतिबंध क्यों..
दुबई सरकार ने शीशा पर कई साल पहले तंबाकू विरोधी मुहिम के तहत प्रतिबंध लगा दिया था। इसकी वजह थी पैसिव स्मोकिंग। बाद में कई बड़े देशों ने भी इस पर सख्ती से प्रतिबंध लगा दिया।
हवा में तैरती मौत..
सार्वजनिक स्थानों पर पैसिव स्मोकिंग से खासतौर पर बच्चों को क्रोंस डीजीज होने की आशंका रहती है। जिससे उनका मानसिक और बौद्धिक विकास रुक जाता है। विश्व में हर साल लगभग ५३ हजार नॉन स्मोकर्स की मौत की वजह पैसिव स्मोकिंग है।
हर कश में जहर
रेस्तरां में खुले आम परोसे जाने वाले शीशा के हर कश में कई घातक रसायन निकलते हैं। जिनमें ऐसीटोन (पेंट स्ट्रीपर), आमोनिया (फ्लोर क्लीनर), नफ्थेलैमिन, मेथोनॉल (राकेट फ्यूल), पाइरीन, डाई मैथिल नाइट्रोसैमीन, नफ्थेलीन (कपूर की गोली), केडमियम (बैटरी में इस्तेमाल होने वाला पदार्थ), कार्बन डाइमोनोऑक्साइड, बेंजोपाइरीन, वाइनिल क्लोराइड, हाइड्रोजन सायनाइड (दमघोटू गैस), टोल्यूडिन, युरेथेन, टल्यूइनस, आर्सेनिक (कीटनाशक), डाय बेंजो क्रीडीन, फिनोल, बयूटेन (लाइटर फ्यूल), पोलोनियम-210 (रेडियो एक्टिव) और डीडीटी मुख्य हैं।
इस लत से बढ़ जाता है कैंसर, हृदय रोग, नंपुसकता और टीबी जैसे करीब 25 घातक रोग का खतरा।
अमेरिका, दुबई, यूएई, जर्मनी, भारत सहित कई बड़े देशों में प्रतिबंधित।
4 हजार रसायन निकलते हैं इस नशे से, जिनमें से 43 कैंसर कारक हैं।
15 वर्ष से कम आयु के 14 प्रतिशत बच्चों में धुम्रपान की लत।
भारत में हर दूसरा पुरुष और हर सातवीं महिला धुम्रपान की लत की शिकार।
करीब 46.5 प्रतिशत पुरुष और 13.8 प्रतिशत महिलाएं धुम्रपान की आदि, जिनमें से 40 प्रतिशत कैंसर रोग से पीड़ित।
तत्कालीन यूनियन हेल्थ मिनिस्टर रामदास अंबुमणि के अनुसार 52 प्रतिशत बच्चे फिल्म स्टार या विज्ञापन को देखकर धुम्रपान की लत का शिकार होते हैं। भारत सहित कई देशों में ऑन स्क्रीन स्मोकिंग पर रोक।